ईरान में पिछले 5 दिनों से जारी भारी विरोध-प्रदर्शनों ने अब एक नया मोड़ ले लिया है। सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की सरकार ने इन प्रदर्शनों को 'पश्चिमी देशों की साजिश' करार दिया है। ईरान की खुफिया एजेंसियों का दावा है कि बाहरी ताकतें इस्लामिक शासन को उखाड़ फेंकने के लिए आंदोलन की आड़ में देश में हिंसा भड़का रही हैं।
विदेशी साजिश और हथियारों की बरामदगी
तस्नीम न्यूज एजेंसी के मुताबिक, खामेनेई आर्मी (IRGC) से जुड़ी खुफिया एजेंसियों ने मीडिया के सामने कुछ चौंकाने वाले सबूत पेश किए हैं:
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सीमा पार से तस्करी: खुफिया विभाग ने 100 से अधिक बंदूकें जब्त की हैं। दावा किया गया है कि ये हथियार प्रदर्शनकारियों तक पहुंचाने के लिए सीमा पार से तस्करी कर लाए गए थे।
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विद्रोही एजेंट: सरकार ने 7 संदिग्ध एजेंटों को गिरफ्तार किया है। इनमें से 5 लोग अमेरिका स्थित राजशाहीवादी समूहों (Pro-monarchy groups) के संपर्क में थे, जबकि 2 अन्य यूरोप के विद्रोही संगठनों से जुड़े हुए थे।
सरकार का रुख: 'तख्तापलट की कोशिश'
ईरान सरकार का मानना है कि पश्चिमी देश 1953 की तरह एक बार फिर तख्तापलट (Coup) करने की कोशिश कर रहे हैं। खामेनेई के सलाहकार जनरल हुसैन अशतरी ने चेतावनी देते हुए कहा, "दुश्मन 'अधिकारों' के नारों की आड़ में साजिश रच रहा है। यह समय राष्ट्रीय एकता का है, सामाजिक विभाजन का नहीं।"
आखिर क्यों सुलग रहा है ईरान?
ईरान में इस बवाल की शुरुआत बुनियादी समस्याओं से हुई थी, जो अब एक बड़े राजनीतिक आंदोलन में तब्दील हो गई है:
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जल संकट: देश के कई हिस्सों में पानी की भारी किल्लत ने आम जनता को सड़कों पर उतरने को मजबूर किया।
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महंगाई: बढ़ती आर्थिक बदहाली और महंगाई के खिलाफ सबसे पहले व्यापारियों ने विरोध शुरू किया।
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व्यापक आंदोलन: धीरे-धीरे इस प्रदर्शन में छात्र और महिलाएं भी शामिल हो गईं, जिससे यह सरकार विरोधी लहर बन गई।
1953 के इतिहास का डर
ईरान को डर है कि अमेरिका की सीआईए (CIA) फिर से वही इतिहास दोहरा सकती है जब 1953 में लोकतांत्रिक सरकार का तख्तापलट कर सत्ता हस्तांतरित की गई थी। यही कारण है कि खामेनेई प्रशासन इस बार किसी भी तरह की ढिलाई बरतने के मूड में नहीं है और राजशाहीवादी नेटवर्क को पूरी तरह ध्वस्त करने में जुटा है।