भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) द्वारा रेपो दर को 0.25 प्रतिशत बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत करने और अपने नीतिगत रुख को 'तटस्थ' से 'सख्त' करने के निर्णय का बैंकिंग, वित्तीय क्षेत्र तथा उद्योग जगत ने व्यापक स्वागत किया है। उद्योग विशेषज्ञों और शीर्ष बैंकरों ने इस कदम को बढ़ती मुद्रास्फीति और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच उठाया गया एक संतुलित एवं सोच-समझकर लिया गया फैसला बताया है। केंद्रीय बैंक का मानना है कि चालू वित्त वर्ष के लिए जीडीपी वृद्धि दर के अनुमान को मजबूत बनाए रखते हुए कीमतों में स्थिरता लाना प्राथमिकता है।
भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के चेयरमैन श्रीनिवासुलु शेट्टी ने इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बीच मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाने के लिए यह मौद्रिक सख्ती समय की मांग थी। उद्योग संगठन एसोचैम (ASSOCHAM) और निर्यातकों की संस्था फियो (FIEO) ने भी माना कि लंबे समय में यह नीति अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करेगी। हालांकि, उद्योग प्रतिनिधियों ने संकेत दिया कि ब्याज दरों में इस वृद्धि से नए ऋण और गृह ऋण (Home Loans) महंगे हो सकते हैं, जिससे अल्पावधि में पूंजीगत व्यय और उपभोक्ता मांग पर आंशिक प्रभाव पड़ सकता है।
वित्तीय विश्लेषकों के अनुसार, इस निर्णय के बाद बैंकों द्वारा जमा दरों (FD Rates) और ऋण दरों (Lending Rates) में जल्द ही संशोधन देखने को मिलेगा। अकाउंट एग्रीगेटर फ्रेमवर्क में सुधार और एक एकीकृत वित्तीय पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण से जुड़े आरबीआई के अन्य विकासात्मक प्रस्तावों की भी बाजार विशेषज्ञों ने सराहना की है।